Shall we take Prasad?
मसीहो को परमेश्वर ने अनोखा बनाया है और उनको विशेष उद्देश्य के लिए चुना है। ऐसा इसलिए है क्यूंकि हमारा बनाने वाला प्रभु खुद अनोखा और विशेष है, और ये अनोखापन मसीहो को दूसरे धर्मों के लोगों में भिन्नता को दिखता है। ये अंतर कभी कभी हमे ऐसी परिस्थिति में पंहुचा देता है, जिससे हमे कुछ तकलीफ या दिक्कत का सामना करना पड़ता है। उन्ही में से बहुत सामान्य है, यह स्थिति आपको आपके स्कूल, ऑफिस इत्यादि में त्योहारों के दौरान देखने में आती है। हमारे भारत के लोग बहुत प्यारे है। यह लोग हमेशा अपनी ख़ुशी को बाटना चाहते है। जब हमारे हिन्दू भाई - बहन मंदिर पूजा करने जाते है तो अपने प्रेम को बांटने के लिए आपको प्रसाद देते है। अब यहाँ मसीहो के मन में युद्ध शुरू हो जाता है और बहुत से सवाल खड़े हो जाते है, कि में यह प्रसाद खाऊ या नहीं खाऊ? अगर में इसे माना करूँगा तो उसे बुरा लगेगा, वो कहेगा जब आप क्रिसमस में हमे केक देते हो और ईस्टर में चॉकलेट देते हो तो हम ले लेते है। अगर आप सोचेंगे की मेरे दोस्त को बुरा लगेगा तो ऐसी परिस्थिति में आपको क्या करना चाहिए? तो हम इसी विषय पर नज़र डालेंगे और यह देखेंगे कि मसीही होते हुए हम प्रसाद खा सकते है कि नहीं? हा या ना का निर्णय लेने से पहले हमे जानना ज़रूरी है कि यह शब्द प्रसाद का क्या अर्थ है ? इस शब्द के अंदर क्या क्या बाते है हम अपनी व्याख्या से देखेंगे।
प्रसाद का क्या अर्थ है ?
प्रसाद वह वस्तु है (खाने की वस्तु होती है) जो किसी भगवान को चढ़ाया जाता है और भक्त इसे खाते है। हरे कृष्णा वाले भगवद गीता के आधार पर मानते है, कि पुरी सृष्टि और दुनिया का सृजनहार कृष्णा है, तो सभी वस्तु को पहले उनको चढ़ाना होगा, वह स्वीकार करेंगे फिर उनके भक्त उसके बाद उसे खाते है, उसे ही प्रसाद कहते है।
पहला प्रश्न, क्या हम मसीह यह मानते है की यीशु मसीह एक दूसरा भगवान है या कोई और देवता है ? बाइबल साफ इस बात को स्वीकार करती है यशायाह 45:5, 43:11, 44:6 कि यीशु मसीह के अलावा कोई परमेश्वर नहीं है। यीशु के अलावा कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। तो जब हम प्रसाद लेते है और खाते है तो हम इस बात को स्वीकार करते है की यीशु मसीह ही प्रभु नहीं है।
यह शब्द प्रसाद या प्रसादा संस्कृत भाषा का शब्द है, इसका शाब्दिक अर्थ या मतलब है वो वस्तु या वो खाने की चीज़ जिसके ऊपर भगवान या देवी देवता का आशीर्वाद होता है या कृपा होती है। हरे कृष्णा वाले भगवद गीता 2:65 के आधार पर कहते है :- प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || अर्थात कृष्णा की कृपा या दया से सारे कष्ट मिट जाएंगे, तो जो प्रसाद खाते है तो उनका कष्ट और पुनर पाप दूर हो जाते है क्योंकि कृष्णा की दया और कृपा होती है।
जैसे हम मसीह बाइबल के आधार पर यह मानते है कि यीशु मसीह ही एकमात्र ईश्वर है, तो क्या हमे वो वस्तु या प्रसाद खाना चाहिए जिस पर वो देवी - देवता या भगवान का आशीर्वाद उतरा है जो अस्तित्व में नहीं है ? यीशु मसीह ने हमे मुक्ति देने के लिए पाप और श्राप से छुड़ाने के लिए सूली पर अपनी जान दी यह मानते हुए प्रसाद खा क़र आप स्वीकार करते है कि कृष्णा की कृपा हमे मुक्ति देती है। दोनों बातों को आप कैसे मान सकते हो, दोनों में से एक को मानो या तो यीशु मसीह का बलिदान हमे मुक्ति देता है, या तो कृष्णा का कृपा मुक्ति देता है।
तो क्या हमें प्रसाद खाना चाहिए ?
आपको निर्णय लेना है, लेकिन कुछ हमारे मसीह लोग है जो अपने आपको बहुत ही ज्ञानी समझते है, वे कहते है यीशु के अलावा कोई खुदा नहीं है। वही आकाश और पृथ्वी को बनाने वाला प्रभु है। और कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। तो जब वो लोग है ही नहीं तो उनको चढ़ाई हुई चीज़ पर क्या आशीर्वाद उतरेगा तो उसे खा सकते है। ऐसे ज्ञानी मसीहो के लिए 1 कुरिन्थियों 8:1-11 वैसे भाइयों के लिए पौलुस उत्तर दे रहा है। कुछ लोग जो अब तक मूर्ति उपासना के आदि है, ऐसी वस्तुएं खाते है और सोचते है जैसे मानो वे वस्तुएं मूर्ति का प्रसाद हो। जब आप प्रसाद स्वीकार करते हो या लेते हो, जो देने वाला है समझता है कि आप उनके विचार से सहमत हो। वो प्रसाद चढ़ा है वो अस्तित्व में है। पौलुस ऐसे ज्ञान वाले मसीहो को सावधान रहने की चेतावनी देते है पद 9-11 में। आप कहोगे कोई और ईश्वर नहीं है और आप प्रसाद खाओगे तो जो कमजोर मसीह है वह सोचेंगे वो खा रहा है तो में भी खा सकता हूँ मतलब ये होगा की कृष्णा भी ईश्वर है। तो क्या हमे प्रसाद ले लेना चाहिए अगर कोई मुस्कुरा के आपको देता है? ऐसा करने से आप यीशु के बलिदान का और अपने उध्दार का मतलब बिगाड़ रहे है।
कुछ लोग कहते है कि प्रसाद को आप ले लो और किसी और को दे दो। ऐसा करने से आप उस व्यक्ति को धोखा दे रहे है। अगर आप हमे पूछोगे तो हम मुस्करा कर कहेंगे जैसे कुछ लोग अपने धर्म के अनुसार मास नहीं खाते है वैसे ही बाइबल के अनुसार हम प्रसाद नहीं खाते, आप बुरा मत मानो, जैसे मास खाना इंकार करना गलत नहीं है तो अगर कोई प्रसाद को इंकार करता है तो वो भी गलत नहीं है, आप अपने धर्म को मानते हो और उसके अनुसार चलते हो। अगर आप प्रसाद खाते हो दो बातो को मानते हो पहली बात यीशु के अलावा किसी दूसरे ईश्वर भी अस्तित्व में है और दूसरी बात आपकी मुक्ति दूसरे ईश्वर के आशीर्वाद से हुई है और आपको उसकी कृपा चाहिए।
अगर कोई व्यक्ति आपसे पूछता कि आप प्रसाद क्यों नहीं खाते हो तो कुछ समय लेके उसे अपने विश्वास जो यीशु मसीह में है उसके बारे में उसे बताये और सुसमाचार सुनाये।
Source: Bro. Fransis S (Glory Apologetics)
Video Link: https://youtu.be/65zG1R0CpnE


