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क्या हम मसीहो प्रसाद खा सकते है ?

   Shall we take Prasad?       

मसीहो को परमेश्वर ने अनोखा बनाया है और उनको विशेष उद्देश्य के लिए चुना है। ऐसा इसलिए है क्यूंकि हमारा बनाने वाला प्रभु खुद अनोखा और विशेष है, और ये अनोखापन मसीहो को दूसरे धर्मों के लोगों में भिन्नता को दिखता है। ये अंतर कभी कभी हमे ऐसी परिस्थिति में पंहुचा देता है, जिससे हमे कुछ तकलीफ या दिक्कत का सामना करना पड़ता है। उन्ही में से बहुत सामान्य है, यह स्थिति आपको आपके स्कूल, ऑफिस इत्यादि में त्योहारों के दौरान देखने में आती है। हमारे भारत के लोग बहुत प्यारे है। यह लोग हमेशा अपनी ख़ुशी को बाटना चाहते है। जब हमारे हिन्दू भाई - बहन मंदिर पूजा करने जाते है तो अपने प्रेम को बांटने के लिए आपको प्रसाद देते है। अब यहाँ मसीहो के मन में युद्ध शुरू हो जाता है और बहुत से सवाल खड़े हो जाते है, कि में यह प्रसाद खाऊ या नहीं खाऊ? अगर में इसे माना करूँगा तो उसे बुरा लगेगा, वो कहेगा जब आप क्रिसमस में हमे केक देते हो और ईस्टर में चॉकलेट देते हो तो हम ले लेते है। अगर आप सोचेंगे की मेरे दोस्त को बुरा लगेगा तो ऐसी परिस्थिति में आपको क्या करना चाहिए? तो हम इसी विषय पर नज़र डालेंगे और यह देखेंगे कि मसीही होते हुए हम प्रसाद खा सकते है कि नहीं? हा या ना का निर्णय लेने से पहले हमे जानना ज़रूरी है कि यह शब्द प्रसाद का क्या अर्थ है ? इस शब्द के अंदर क्या क्या बाते है हम अपनी व्याख्या से देखेंगे।   

 प्रसाद का क्या अर्थ है ? 

प्रसाद वह वस्तु है (खाने की वस्तु होती है) जो किसी भगवान को चढ़ाया जाता है और भक्त इसे खाते है। हरे कृष्णा वाले भगवद गीता के आधार पर मानते है, कि पुरी सृष्टि और दुनिया का सृजनहार कृष्णा है, तो सभी वस्तु को पहले उनको चढ़ाना होगा, वह स्वीकार करेंगे फिर उनके भक्त उसके बाद उसे खाते है, उसे ही प्रसाद कहते है।

पहला प्रश्न, क्या हम मसीह यह मानते है की यीशु मसीह एक दूसरा भगवान है या कोई और देवता है ? बाइबल साफ इस बात को स्वीकार करती है यशायाह 45:5, 43:11, 44:6 कि यीशु मसीह के अलावा कोई परमेश्वर नहीं है। यीशु के अलावा कोई सृष्टिकर्ता नहीं है। तो जब हम प्रसाद लेते है और खाते है तो हम इस बात को स्वीकार करते है की यीशु मसीह ही प्रभु नहीं है। 

यह शब्द प्रसाद या प्रसादा संस्कृत भाषा का शब्द है, इसका शाब्दिक अर्थ या मतलब है वो वस्तु या वो खाने की चीज़ जिसके ऊपर भगवान या देवी देवता का आशीर्वाद होता है या कृपा होती है। हरे कृष्णा वाले भगवद गीता 2:65 के आधार पर कहते है :- प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || अर्थात कृष्णा की कृपा या दया से सारे कष्ट मिट जाएंगे, तो जो प्रसाद खाते है तो उनका कष्ट और पुनर पाप दूर हो जाते है क्योंकि कृष्णा की दया और कृपा होती है।

जैसे हम मसीह बाइबल के आधार पर यह मानते है कि यीशु मसीह ही एकमात्र ईश्वर है, तो क्या हमे वो वस्तु या प्रसाद खाना चाहिए जिस पर वो देवी - देवता या भगवान का आशीर्वाद उतरा है जो अस्तित्व में नहीं है ? यीशु मसीह ने हमे मुक्ति देने के लिए पाप और श्राप से छुड़ाने के लिए सूली पर अपनी जान दी यह मानते हुए प्रसाद खा क़र आप स्वीकार करते है कि कृष्णा की कृपा हमे मुक्ति देती है। दोनों बातों को आप कैसे मान सकते हो, दोनों में से एक को मानो या तो यीशु मसीह का बलिदान हमे मुक्ति देता है, या तो कृष्णा का कृपा मुक्ति देता है।


तो क्या हमें प्रसाद खाना चाहिए ?

 आपको निर्णय लेना है, लेकिन कुछ हमारे मसीह लोग है जो अपने आपको बहुत ही ज्ञानी समझते है, वे  कहते है यीशु के अलावा कोई खुदा नहीं है। वही आकाश और पृथ्वी को बनाने वाला प्रभु है। और कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। तो जब वो लोग है ही नहीं तो उनको चढ़ाई हुई चीज़ पर क्या आशीर्वाद उतरेगा तो उसे खा सकते है। ऐसे ज्ञानी मसीहो के लिए 1  कुरिन्थियों 8:1-11 वैसे भाइयों के लिए पौलुस उत्तर दे रहा है। कुछ लोग जो अब तक मूर्ति उपासना के आदि है, ऐसी वस्तुएं खाते है और सोचते है जैसे मानो वे वस्तुएं मूर्ति का प्रसाद हो। जब आप प्रसाद स्वीकार करते हो या लेते हो, जो देने वाला है  समझता है कि आप उनके विचार से सहमत हो। वो  प्रसाद चढ़ा है वो अस्तित्व में है। पौलुस ऐसे ज्ञान वाले मसीहो को सावधान रहने की चेतावनी देते है पद 9-11 में। आप कहोगे कोई और ईश्वर नहीं है और आप प्रसाद खाओगे तो जो कमजोर मसीह है वह सोचेंगे वो खा रहा है तो में भी खा सकता हूँ  मतलब ये होगा की कृष्णा भी ईश्वर है। तो क्या हमे प्रसाद ले लेना चाहिए अगर कोई मुस्कुरा के आपको देता है? ऐसा करने से आप यीशु के बलिदान का और अपने उध्दार का मतलब बिगाड़ रहे है। 

कुछ लोग कहते है कि प्रसाद को आप ले लो और किसी और को दे दो। ऐसा करने से आप उस व्यक्ति को धोखा दे रहे है। अगर आप हमे पूछोगे तो हम मुस्करा कर कहेंगे जैसे कुछ लोग अपने धर्म के अनुसार मास नहीं खाते है वैसे ही बाइबल के अनुसार हम प्रसाद नहीं खाते, आप बुरा मत मानो, जैसे मास खाना इंकार करना गलत नहीं है तो अगर कोई प्रसाद को इंकार करता है तो वो भी गलत नहीं है, आप अपने धर्म को मानते हो और उसके अनुसार चलते हो। अगर आप प्रसाद खाते हो दो बातो को मानते हो पहली बात यीशु के अलावा किसी दूसरे ईश्वर भी अस्तित्व में है और दूसरी बात आपकी मुक्ति दूसरे ईश्वर के आशीर्वाद से हुई है और आपको उसकी कृपा चाहिए। 

अगर कोई व्यक्ति आपसे पूछता कि आप प्रसाद क्यों नहीं खाते हो तो कुछ समय लेके उसे अपने विश्वास जो यीशु मसीह में है उसके बारे में उसे बताये और सुसमाचार सुनाये।


Source: Bro. Fransis S (Glory Apologetics) 

Video Link: https://youtu.be/65zG1R0CpnE 


थोमा (Thomas)


थोमा, जिसे अक्सर "संदेही थोमा" के रूप में याद किया जाता है, अपने विश्वास के लिए सम्मान के योग्य है। वह संदेही था, लेकिन उसकी संदेहो का एक उद्देश्य था - वह सत्य जानना चाहता था। थोमा ने अपने संदेहों को मूर्तिमान नहीं किया; ऐसा करने के लिए कारण दिए जाने पर उन्होंने खुशी-खुशी विश्वास किया। उन्होंने अपने संदेहो को पूर्ण रूप से व्यक्त किया और उनका पूर्ण रूप से उत्तर दिया। संदेह करना केवल उसके उत्तर देने का उसका तरीका था, न कि उसके जीवन का तरीका।

यद्यपि थोमा की हमारी झलक संक्षिप्त है, उनका चरित्र निरंतरता के साथ आता है। उसने जो कुछ भी महसूस किया, उसके बावजूद वह जो जानता था, उसके प्रति विश्वासयोग्य रहने के लिए संघर्ष किया। एक बार जब यह स्पष्ट हो गया कि यीशु का जीवन खतरे में है, तो केवल थोमा ने उन शब्दों को व्यक्त किया जो अधिकांश लोग महसूस कर रहे थे, "आओ हम उसके साथ मरने को चले" (यूहन्ना 11:16)। उसने यीशु का अनुसरण करने में संकोच नहीं किया।

हम नहीं जानते कि पुनरुत्थान के बाद यीशु पहली बार चेलों के सामने आया तो थोमा क्यों अनुपस्थित था, लेकिन वह मसीह के पुनरुत्थान की उनकी गवाही पर विश्वास करने के लिए अनिच्छुक था। दस दोस्त भी नहीं बदल पाए उसका इरादा!

हम संदेहपूर्ण जीवन जीने के बिना संदेह कर सकते हैं। संदेह पुनर्विचार को प्रोत्साहित करता है। इसका मकसद दिमाग को बदलने से ज्यादा दिमाग को तेज करना है। संदेह का उपयोग प्रश्न पूछने, उत्तर प्राप्त करने और निर्णय के लिए दबाव डालने के लिए किया जा सकता है। लेकिन संदेह का मतलब कभी भी स्थायी स्थिति नहीं है। संदेह एक पैर उठाना, जो आगे या पीछे कदम रखने के लिए तैयार है। पैर नीचे आने तक कोई गति नहीं होती है।

जब आप संदेह का अनुभव करते हैं, तो थोमा से प्रोत्साहन लें। वह अपने संदेह में नहीं रहा, लेकिन यीशु को उसे विश्वास में लाने की अनुमति दी। इस तथ्य से भी प्रोत्साहन लें कि मसीह के अनगिनत अन्य अनुयायियों ने संदेहों से संघर्ष किया है। परमेश्वर ने उन्हें जो उत्तर दिया वह आपकी भी मदद कर सकता है। संदेह में मत बैठो, बल्कि उनसे निर्णय और विश्वास की ओर बढ़ो। एक और विश्वासी खोजें जिसके साथ आप अपने संदेहो को साझा कर सकें। मौन संदेहो का उत्तर शायद ही मिलता है।

 

  • ताकत और उपलब्धियां :

    • यीशु के 12 शिष्यों में से एक 

    • संदेह और विश्वास दोनों में तीव्र व्यक्ति

    • एक विश्वासयोग्य और ईमानदार व्यक्ति

 

  • कमजोरी और गलतियाँ:

    • दूसरों के साथ, यीशु को छोड़ दिया,

    • दूसरों के मसीह को देखने के दावों पर विश्वास करने से इनकार किया और सबूत की मांग की

    • निराशावादी दृष्टिकोण के साथ संघर्ष किया

 

  • जीवन से सबक:

    • यीशु उन संदेहों को अस्वीकार नहीं करते जो निष्कपट हैं और विश्वास की ओर निर्देशित हैं

    • मौन रह के अविश्वास करने की तुलना में ज़ोर से संदेह करना बेहतर है

 

  • महत्वपूर्ण आयाम :

    • कहाँ : गलील, यहूदिया, सामरिया

    • व्यवसाय : यीशु का शिष्य

    • समकालीन : यीशु, अन्य शिष्य, हेरोदेस अंतिपास, पिलातुस

 

  • मुख्य पद : तब उस ने थोमा से कहा, अपनी उंगली यहां लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो। यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर! यूहन्ना 20:27-28

 

थोमा की कहानी सुसमाचार में बताई गई है। उसका उल्लेख प्रेरितों के काम 1:13 में भी किया गया है।


Source : NIV Life Application Study Bible.


ଥୋମା (Thomas)

     ଥୋମା, ପ୍ରାୟତ "ସନ୍ଦେହୀ ଥୋମା" ଭାବରେ ସ୍ମରଣୀୟ, ତାଙ୍କ ବିଶ୍ୱାସ ପାଇଁ ସମ୍ମାନର ଯୋଗ୍ୟ | ସେ ସନ୍ଦେହ କରୁଥିଲେ, କିନ୍ତୁ ତାଙ୍କର ସନ୍ଦେହର ଏକ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ଥିଲା - ସେ ସତ୍ୟ ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଥିଲେ | ଥୋମା ତାଙ୍କର ସନ୍ଦେହକୁ ମୂର୍ତ୍ତିମାନ କରିନଥିଲେ; ତାଙ୍କର ସନ୍ଦେହର ଉତ୍ତର ପାଇବା ପରେ ସେ ଖୁସିରେ ବିଶ୍ୱାସ କଲେ | ସେ ତାଙ୍କର ସନ୍ଦେହକୁ ସଂପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବରେ ପ୍ରକାଶ କରିଥିଲେ ଏବଂ ସେ ସେସବୁର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଉତ୍ତର ଦେଇଥିଲେ | ସନ୍ଦେହ କରିବା କେବଳ ତାଙ୍କର ପ୍ରତିକ୍ରିୟାର ଉପାୟ ଥିଲା, ତାଙ୍କ ଜୀବନଶୈଳୀ ନଥିଲା

    ଯଦିଓ ଥୋମାଙ୍କ ବିଷୟରେ ସଂକ୍ଷିପ୍ତ ଜାଣୁ, ତାଙ୍କ ଚରିତ୍ର ସ୍ଥିରତା ସହିତ ଆସେ | ସେ ଯାହା ଅନୁଭବ କରିଥିଲେ ତାହାଠାରୁ ସେ ଯାହା ଜାଣିଥିଲେ ସେଥିରେ ବିଶ୍ୱସ୍ତ ରହିବାକୁ ସଂଘର୍ଷ କରିଥିଲେ | ଥରେ ଏହା ସ୍ପଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା ଯେ ଯୀଶୁଙ୍କ ଜୀବନ ବିପଦରେ ଥିଲା, କେବଳ ଥୋମା ହିଁ ଅଧିକାଂଶ ଲୋକ ଅନୁଭବ କରିଥିବା ଶବ୍ଦକୁ ପ୍ରକାଶ କରିଥିଲେ, "ସେଥିରେ ଥୋମା, ଯାହାଙ୍କୁ ଦିଦୁମ ବୋଲି କହନ୍ତି, ସେ ଆପଣା ସଙ୍ଗୀ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କୁ କହିଲେ, ଚାଲ, ଆମ୍ଭେମାନେ ମଧ୍ୟ ଯାଇ ତାହାଙ୍କ ସାଙ୍ଗରେ ମରିବା।" (ଯୋହନ ୧୧:୧୬) | ସେ ଯୀଶୁଙ୍କୁ ଅନୁସରଣ କରିବାକୁ କୁଣ୍ଠାବୋଧ କଲେ ନାହିଁ।

    ପୁନରୁ‌ତ୍‌ଥାନ ପରେ ଯୀଶୁ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଦର୍ଶନ ଦେଲାବେଳେ ଥୋମା ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କ ନିକଟରେ କାହିଁକି ଅନୁପସ୍ଥିତ ଥିଲେ ଆମେ ଜାଣୁ ନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ସେ ଖ୍ରୀଷ୍ଟଙ୍କ ପୁନରୁତ୍ଥାନର ସାକ୍ଷ୍ୟକୁ ବିଶ୍ଵାସ କରିବାକୁ ଅନିଚ୍ଛା ପ୍ରକାଶ କଲେ | ଦଶଜଣ ସାଙ୍ଗ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ବା ମନକୁ ବଦଳାଇ ପାରିଲେ ନାହିଁ ! 

    ସନ୍ଦେହଜନକ ଜୀବନ ନ ବିତାଇ ଆମେ ସନ୍ଦେହ କରିପାରିବା | ସନ୍ଦେହ ପୁନର୍ବିଚାର ପାଇଁ ଉତ୍ସାହିତ କରେ | ଏହାର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ କେବଳ ମନ ପରିବର୍ତ୍ତନ କରିବା ଅପେକ୍ଷା ମନକୁ ଅଧିକ ତୀକ୍ଷଣ କରିବା | ପ୍ରଶ୍ନ ପଚାରିବା, ଉତ୍ତର ପାଇବା ଏବଂ ନିଷ୍ପତ୍ତିକୁ ଆଗକୁ ନେବା ପାଇଁ ସନ୍ଦେହ ବ୍ୟବହାର କରାଯାଇପାରେ | କିନ୍ତୁ ସନ୍ଦେହ କଦାପି ସ୍ଥାୟୀ ଅବସ୍ଥା ନୁହେଁ | ସନ୍ଦେହ ହେଉଛି ପାଦ ଉଠାଇ, ଆଗକୁ କିମ୍ବା ପଛକୁ ଯିବାକୁ ଚିନ୍ତା କରିବା | ପାଦ ତଳକୁ ଆସିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କୌଣସି ଗତି ହୁଏ ନାହିଁ |

    ଯେତେବେଳେ ତୁମେ ସନ୍ଦେହ ଅନୁଭବ କର, ଥୋମାଙ୍କଠାରୁ ଉତ୍ସାହ ନିଅ | ସେ ନିଜ ସନ୍ଦେହରେ ରହିଲେ ନାହିଁ, କିନ୍ତୁ ଯୀଶୁ ଯେପରି ତାଙ୍କୁ ବିଶ୍ୱାସରେ ଆଣିବେ, ଏଥିପାଇଁ ଅନୁମତି ଦେଲେ | ଏଥିରୁ ପ୍ରେରଣା ନିଅ ଯେ ଖ୍ରୀଷ୍ଟଙ୍କ ଅଗଣିତ ଅନ୍ୟ ଅନୁଗାମୀମାନେ ସନ୍ଦେହ ସହିତ ସଂଘର୍ଷ କରିଛନ୍ତି | ଈଶ୍ଵର ସେମାନଙ୍କୁ ଦେଇଥିବା ଉତ୍ତର ଆପଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ସାହାଯ୍ୟ କରିପାରିବ | ସନ୍ଦେହରେ ବସନ୍ତୁ ନାହିଁ, ବରଂ ସେମାନଙ୍କଠାରୁ ନିଷ୍ପତି ଏବଂ ବିଶ୍ୱାସକୁ ଯାଆନ୍ତୁ | ଅନ୍ୟ ଜଣେ ବିଶ୍ଵାସୀଙ୍କୁ ଖୋଜ, ଯାହା ସହିତ ତୁମେ ତୁମର ସନ୍ଦେହ ବାଣ୍ଟି ପାରିବ | ନୀରବ ସନ୍ଦେହ କ୍ୱଚିତ୍ ଉତ୍ତର ପାଇଥାଏ |

ଶକ୍ତି ଏବଂ ସଫଳତା:

  • ଯୀଶୁଙ୍କ ୧୨ ଶିଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଜଣେ |

  • ଉଭୟ ସନ୍ଦେହ ଏବଂ ବିଶ୍ୱାସରେ ତୀବ୍ର ବ୍ୟକ୍ତି |

  • ଜଣେ ବିଶ୍ୱସ୍ତ ଏବଂ ସଚ୍ଚୋଟ ବ୍ୟକ୍ତି |

 ଦୁର୍ବଳତା ଏବଂ ତ୍ରୁଟି:

  • ଯୀଶୁଙ୍କୁ ଛାଡି ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ସହିତ ଚାଲିଗଲେ ଯେତେବେଳେ ଯୀଶୁ ବନ୍ଦୀ ହେଲେ। ,

  • ଖ୍ରୀଷ୍ଟଙ୍କୁ ଦେଖିବା ଏବଂ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଦାବିକୁ ବିଶ୍ୱାସ କରିବାକୁ ମନା କରି ପ୍ରମାଣ ଦାବି କଲେ |

  • ଏକ ନିରାଶାବାଦୀ ଦୃଷ୍ଟିକୋଣ ସହିତ ସଂଘର୍ଷ କରିଥିଲେ |

ଜୀବନରୁ ଶିକ୍ଷା:

  • ଯୀଶୁ ସନ୍ଦେହକୁ ପ୍ରତ୍ୟାଖ୍ୟାନ କରନ୍ତି ନାହିଁ ଯାହା ଆନ୍ତରିକ ଏବଂ ବିଶ୍ୱାସ ଆଡକୁ ଥାଏ |

  • ନୀରବରେ ଅବିଶ୍ୱାସ କରିବା ଅପେକ୍ଷା ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରରେ ସନ୍ଦେହ କରିବା ଭଲ |

 ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ପରିମାଣ:

  • କେଉଁଠାରେ: ଗାଲିଲୀ, ଯିହୁଦା, ଶମିରୋଣ |

  • ବୃତ୍ତି: ଯୀଶୁଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ |

  • ସମସାମୟିକ: ଯୀଶୁ, ଅନ୍ୟ ଶିଷ୍ୟ, ହେରୋଦ ଆଣ୍ଟିପାସ୍, ପୀଲାତ |

ମୁଖ୍ୟ ପଦ: 

ପରେ ସେ ଥୋମାଙ୍କୁ କହିଲେ, ଏଆଡ଼େ ତୁମ୍ଭର ଆଙ୍ଗୁଳି ବଢ଼ାଇ ମୋହର ହାତ ଦେଖ ଓ ହାତ ବଢ଼ାଇ ମୋହର କକ୍ଷଦେଶରେ ଦିଅ; ଅବିଶ୍ଵାସୀ ନ ହୋଇ ବିଶ୍ଵାସୀ ହୁଅ। ଥୋମା ତାହାଙ୍କୁ ଉତ୍ତର ଦେଲେ, ମୋହର ପ୍ରଭୁ, ମୋହର ଈଶ୍ଵର। ଯୋହନ ୨୦:୨୭-୨୮

ଥୋମାର କାହାଣୀ ସୁସମାଚାରରେ କୁହାଯାଇଛି | ପ୍ରେରିତ ୧:୧୩ ରେ ମଧ୍ୟ ସେ ଉଲ୍ଲେଖ କରାଯାଇଛି । 


Source: Life Application Study Bible

୬୬୬ ର ଅର୍ଥ କ’ଣ?

 ୬୬୬ ର ଅର୍ଥ କ’ଣ?

What is the meaning of 666?


ପ୍ରକାଶିତ ବାକ୍ୟ ୧୩ ଶେଷରେ, ଯାହା ପଶୁ (ଖ୍ରୀଷ୍ଟ ବିରୋଧୀ) ଏବଂ ତାଙ୍କର ମିଥ୍ୟା ଭବିଷ୍ୟ‌ଦ୍‌ବକ୍ତାଙ୍କ ବିଷୟରେ ଆଲୋଚନା କରେ, ଆମେ ପଢୁ, ଏଠାରେ ଜ୍ଞାନ ଆବଶ୍ୟକ। ଯାହାର ବୁଦ୍ଧି ଅଛି, ସେ ପଶୁର ସଂଖ୍ୟା ଗଣନା କରୁ, କାରଣ ତାହା ଜଣେ ମନୁଷ୍ୟର ସଂଖ୍ୟା, ଆଉ ତାହାର ସଂଖ୍ୟା, ହେଉଛି ଛଅ ଶହ ଛଷଠି। ( ପ୍ରକାଶିତ ବାକ୍ୟ ୧୩:୧୮) | କୌଣସି ପ୍ରକାରେ, ୬୬୬ ସଂଖ୍ୟା ହେଉଛି ପଶୁଙ୍କ ପରିଚୟର ଏକ ସୂଚକ | ପ୍ରକାଶିତ ବାକ୍ୟ ୧୩ ମଧ୍ୟ “ପଶୁର ଚିହ୍ନ” (ପଦ ୧୬-୧୭) ବିଷୟରେ ଉଲ୍ଲେଖ କରେ, ଏବଂ ଲୋକପ୍ରିୟ ଚିନ୍ତାଧାରା ପ୍ରାୟତ ୬୬୬ ର ମାର୍କ ସହିତ ଲିଙ୍କ କରେ | ତଥାପି, ପଶୁର ଚିହ୍ନ ଏବଂ ୬୬୬ ଦୁଇଟି ଭିନ୍ନ ବିଷୟ ପରି ଦେଖାଯାଏ | ଏକ ପଶୁର ଚିହ୍ନ ହେଉଛି କିଛି ଯାହାକି କିଣିବା ଏବଂ ବିକ୍ରୟ କରିବା ପାଇଁ ଲୋକମାନେ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ହାସଲ କରିବେ | ସଂଖ୍ୟା ୬୬୬ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ପଶୁ/ଖ୍ରୀଷ୍ଟ ବିରୋଧୀ ସହିତ ତାଙ୍କର "ସଂଖ୍ୟା" ଭାବରେ ଜଡିତ | ଅବଶ୍ୟ, ତାଙ୍କ ସଂଖ୍ୟା ହୁଏତ ତାଙ୍କ ଚିହ୍ନର ଅଂଶ ହୋଇପାରେ, କିନ୍ତୁ ବାଇବଲ ଏକ ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ ସଂଯୋଗ ପ୍ରଦାନ କରେ ନାହିଁ |



୬୬୬ ର ଅର୍ଥ ଏକ ରହସ୍ୟ ଏବଂ ଏହା ଦେଖାଯାଏ ଯେ, ପ୍ରେରିତ ଯୋହନ, ପବିତ୍ରଆତ୍ମାଙ୍କ ପ୍ରେରଣା ଅନୁଯାୟୀ ଲେଖିଥିଲେ, ତେଣୁ ଏହାକୁ ଏହିପରି ଲେଖିବାକୁ ଉଦ୍ଦିଷ୍ଟ | ଏହାକୁ ହିସାବ କରି ଯୋହନ କହିଛନ୍ତି ଯେ ଏଥିପାଇଁ “ଜ୍ଞାନ” ଆବଶ୍ୟକ | କେତେକ, ଜ୍ୟାମିତିକୁ ବ୍ୟବହାର କରି (ଗୋଟିଏ ନାମ କିମ୍ବା ଶବ୍ଦର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅକ୍ଷରକୁ ଏକ ସାଂଖ୍ୟିକ ମୂଲ୍ୟ ନ୍ୟସ୍ତ କରିବା ଏବଂ ତା’ପରେ ସମୁଦାୟ ସଂଖ୍ୟାରେ ପହଞ୍ଚିବା ପାଇଁ ସଂଖ୍ୟା ଯୋଡିବା), ଖ୍ରୀଷ୍ଟ ବିରୋଧୀକୁ ବିଶ୍ଵ ଇତିହାସର ବିଭିନ୍ନ ବ୍ୟକ୍ତି ଭାବରେ ଚିହ୍ନଟ କରିଛନ୍ତି | କେତେକ ଲୋକପ୍ରିୟ ଲକ୍ଷ୍ୟ ହେଉଛି "କାଇସର ନେରୋ", "ରୋନାଲ୍ଡ ୱିଲସନ ରେଗାନ", "ମିଖାଇଲ ଗୋର୍ବାଚେଭ" ଏବଂ ରୋମାନ କ୍ୟାଥୋଲିକ ଇତିହାସରେ ବିଭିନ୍ନ ପପ (Pope)। କିଛି ଲୋକ ୬୬୬ ସହିତ ଜଣେ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କ ନାମକୁ ଯୋଡିବା ପାଇଁ ଏକ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଜନକ ଲମ୍ବା ରାସ୍ତା ଯାଆନ୍ତି | ଯଥେଷ୍ଟ ଗାଣିତିକ ବ୍ୟାୟାମ ପ୍ରୟୋଗ ହେଲେ କୌଣସି ନାମ ପ୍ରକୃତରେ ୬୬୬ ସହିତ ଜଡିତ ହୋଇପାରେ |


କୌତୁହଳର ବିଷୟ, ପ୍ରକାଶିତ ପୁସ୍ତକର କେତେକ ପ୍ରାଚୀନ ଗ୍ରୀକ୍ ପାଣ୍ଡୁଲିପିରେ ଏହି ସଂଖ୍ୟା ୬୬୬ ପରିବର୍ତ୍ତେ ୬୧୬ ଭାବରେ ଦିଆଯାଇଛି। ପାଣ୍ଡୁଲିପି-ଆଧାରିତ ପ୍ରମାଣ ୬୬୬ ସପକ୍ଷରେ ଅଧିକ ଦୃଢ ଅଟେ, କିନ୍ତୁ ୬୧୬ ର ବିକଳ୍ପ ପଢି ଗଣନା କରିବା ପୂର୍ବରୁ ଆମକୁ କିଛି ସମୟ ବିରାମ ଦେବା ଉଚିତ୍ |


୬୬୬ ସଂଖ୍ୟା ଏହି ପଶୁକୁ କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଚିହ୍ନଟ କରିବ, କିନ୍ତୁ ୬୬୬ ସଂଖ୍ୟା କିପରି ପଶୁ ସହିତ ଜଡିତ ହେବ ତାହା ପ୍ରକାଶିତ ବାକ୍ୟ ୧୩:୧୮ ର ମୂଳ ବିଷୟ ନୁହେଁ | ଈଶ୍ବର ଏବଂ ତାଙ୍କର ସିଦ୍ଧତା ବିଷୟରେ ବାଇବଲ ପ୍ରାୟତ ୭ ସଂଖ୍ୟା ବ୍ୟବହାର କରେ | ୬ ନମ୍ବର ମନୁଷ୍ୟକୁ ବୁଝାଏ, ଯିଏ ଷଷ୍ଠ ଦିନରେ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଥିଲା ଏବଂ ଯିଏ ଈଶ୍ବରଙ୍କ ଗୌରବରୁ ସବୁଦିନ ପାଇଁ ବଞ୍ଚିତ ହୋଇଥିଲା | ପଶୁ / ଖ୍ରୀଷ୍ଟ ବିରୋଧୀ ଖ୍ରୀଷ୍ଟଙ୍କ ପରି ହେବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରିବେ | ସେ ନିଜକୁ ଈଶ୍ବର ବୋଲି ମଧ୍ୟ କହିପାରନ୍ତି | କିନ୍ତୁ, ଯେହେତୁ ୬ ସଂଖ୍ୟା ୭ ନମ୍ବରରୁ କମ୍ ହୋଇଯାଏ, ପଶୁ/ଖ୍ରୀଷ୍ଟ ବିରୋଧୀ, ଏହାର “ତ୍ରିଶକ୍ତି” ସହିତ, ଶେଷରେ ଈଶ୍ବରଙ୍କୁ ପରାସ୍ତ କରିବାରେ ବିଫଳ ହେବେ |


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666 का क्या अर्थ है?

 666 का क्या अर्थ है?

What is the meaning of 666?


प्रकाशितवाक्य अध्याय 13 का अन्त, पशु (मसीह विरोधी) और उसके झूठे भविष्यद्वक्ता के ऊपर चर्चा करता है, जहाँ हम ऐसा पढ़ते हैं, "ज्ञान इसी में है : जिसे बुद्धि हो वह इस पशु का अंक जोड़ ले, क्योंकि वह मनुष्य का अंक है, और उसका अंक छ: सौ छियासठ है" (वचन 18)। किसी तरह, सँख्या 666 पशु की पहचान के लिए एक संकेत है। प्रकाशितवाक्य 13 में "पशु के अंक" (वचन 16-17) का उल्लेख मिलता है और लोकप्रिय विचार अक्सर इस अंक को 666 के साथ जोड़ता है; यद्यपि, पशु का चिन्ह अर्थात् अंक और 666 दो भिन्न बातों के प्रगट होने का आभास देते हैं। पशु की छाप कुछ ऐसी बात है जिसे लोगों को कुछ भी खरीदने और बेचने के लिए प्राप्त करनी चाहिए। सँख्या 666 किसी तरह से पशु/मसीह विरोधी के साथ "उसके" अंक के रूप में जुड़ी हुई है। नि:सन्देह, उसका अंक उसकी छाप का अंश हो सकती है, परन्तु बाइबल एक निश्‍चित सम्पर्क को प्रदान नहीं करती है।


666 का अर्थ एक रहस्य है और ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेरित यूहन्ना, पवित्र आत्मा की प्रेरणा के अधीन लिखने के कारण इसे ऐसे ही लिखने की मंशा रखता है। इसकी गणना करते हुए, यूहन्ना कहता है कि इसके लिए, "ज्ञान" की आवश्यकता होती है। कुछ, लोग ज्यामिति विज्ञान का उपयोग करते हुए (किसी नाम या शब्द के प्रत्येक अक्षर को सँख्यात्मक मान निर्दिष्ट करते हुए और फिर कुल सँख्या तक पहुँचने के लिए सँख्याओं को जोड़ते हैं) ने विश्‍व के इतिहास में विभिन्न लोगों के रूप में मसीह विरोधी की पहचान की है। कुछ लोकप्रिय लक्ष्य "कैसर नीरो", "रोनाल्ड विल्सन रीगन," "मिखाइल गोर्बाचेव" और रोमन कैथोलिक इतिहास के विभिन्न पोप रहे हैं। किसी व्यक्ति के नाम को 666 के साथ जोड़ने के लिए कुछ लोग आश्चर्यजनक रीति से बहुत दूरी तक चले जाते हैं। यदि पर्याप्त गणितीय व्यायाम को लागू किया जाए तो किसी भी नाम को 666 से वास्तविक रूप में जोड़ा जा सकता है।


रूचिपूर्ण बात यह है कि प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की कुछ प्राचीन यूनानी पाण्डुलिपियों में, सँख्या 666 के स्थान पर 616 के रूप में दी गई है। पाण्डुलिपि आधारित प्रमाण 666 के पक्ष अधिक दृढ़ता से पाए जाते हैं, परन्तु 616 के वैकल्पिक को पठ्न की गणना करने से पहले हमें थोड़ी देर के लिए रूकना चाहिए।


अंक 666 किसी तरह से पशु की पहचान करेगा, परन्तु 666 का अंक पशुओं के साथ कैसे जुड़ा हुआ है, यह प्रकाशितवाक्य 13:18 का मुख्य सार नहीं है। परमेश्‍वर और उसकी पूर्णता के सन्दर्भ में बाइबल अक्सर सँख्या 7 का उपयोग करता है। सँख्या 6 को मनुष्य के लिए सोची गई है, जिसे छठे दिन बनाया गया था और जो सदा के लिए परमेश्‍वर की "महिमा से रहित" हो गया है। पशु/मसीह विरोधी परमेश्‍वर की तरह होने का प्रयास करेगा। वह कदाचित् परमेश्‍वर होने का भी दावा करेगा। परन्तु, जैसा कि सँख्या 6 सँख्या 7 से कम हो जाती है, वैसे ही पशु/मसीह विरोधी, अपनी छह के "त्रिएकत्व" के साथ, अन्त में परमेश्‍वर को पराजित करने के प्रयास में विफल हो जाएगा।


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